Tuesday, March 31, 2020

मुझी को रोना है

बंद देश में, सोचता हूँ, कहाँ जाऊँ,
भूख से तड़पते बच्चो को,
रोटी मैं कैसे खिलाऊँ?

फ़िर सोचता हूँ, जोखिम उठा ही लेता हूँ,
कोरोना से तो बचने की भी गुंजाईश है,
पर खाली पेट, कब तक ज़िंदा रह पाऊं?

दम तो बिन कोरोना, भी घुट गया,
माँ पहले ही बीमार है, बूढ़े पापा लाचार हैं,
इन्हे सौ मील, अस्पताल कैसे ले जाऊं?

बताया था किसी ने, इंसान से इंसान में,
सफर करती है ये बीमारी,
जो मैं ढूँढू, इंसान को, इंसान कहीं ना पाऊँ!

सुना है आप भी सोचते हैं,
मेरे परिवार के बारे में,
आप ही बताओ,
मैं कोरोना से मरू, या 
भुखमरी से मर जाऊँ ?




घर

ये जो घर है मेरा, सब कहते हैं— ये किसी पराए का है; इसकी दीवारें किसी और की, छत भी किसी और की, ये घर बस किराए का है! पर इसकी चाबी, कुछ वक़्त ...